संदर्भ : प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के नब्बे साल
तरक्क़ी-पसंद अदीबों का पहला ग्रुप साल 1935 में सज्जाद ज़हीर, डॉ. मुल्कराज आनंद, डॉ. ज्योति घोष, प्रमोद सेनगुप्त और डॉ. मुहम्मद दीन ‘तासीर’ ने लंदन में क़ायम किया था। मालूम हो कि लंदन में ही प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणा-पत्र का मसौदा तैयार हुआ। बाद में ग्रुप ने इस मसौदे को साइक्लोस्टाइल करके हिन्दुस्तान के अपने दोस्तों मसलन डॉ. मुहम्मद अशरफ़, महमूदुज़्ज़फ़र, डॉ.रशीद जहाँ, प्रोफे़सर हीरेन मुखर्जी, डॉ.युसूफ़ हुसैन ख़ाँ और हत्थी सिंह आदि के नाम भेज दिया। ताकि वे उसे वहॉं के अदीबों को दिखाएं और इस पर उनकी राय लें।
आगे चलकर सज्जाद ज़हीर जब वापस हिन्दुस्तान लौटे, तो उन्होंने प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन को कार्यरूप देने के लिए तमाम भारतीय भाषाओं के प्रमुख लेखकों मसलन कन्हैयालाल मुंशी, अहमद अली, फ़िराक़ गोरखपुरी, डॉ.सैयद ऐजाज़ हुसैन, पं.अमरनाथ झा, डॉ.ताराचंद से प्रगतिशील लेखक संघ के प्रस्तावित घोषणा-पत्र पर विचार-विनिमय शुरू किया। प्रेमचंद से सज्जाद ज़हीर की पहली मुलाक़ात कब और कैसे हुई, इसका ज़िक्र उन्होंने अपनी ऐतिहासिक किताब ‘रौशनाई’ में तफ़सील से किया है।
साल 1935 के दिसम्बर महीने में इलाहाबाद के अंदर हिन्दुस्तानी एकेडमी का एक सम्मेलन आयाजित हुआ। जिसमें उर्दू और हिन्दी के साहित्यकार-डॉ.ताराचंद, मुंशी प्रेमचंद, मौलवी अब्दुल हक़, जोश मलीहाबादी, मुंशी दयानारायण निगम, मौलाना अब्दुस्सलाम नदवी, डॉ. मुहीउद्दीन ज़ोर वगैरह इकट्ठे हुए। प्रेमचंद से उनकी पहली मुलाक़ात यहीं हुई। कॉन्फ्रेंस के दौरान इलाहाबाद यूनीवर्सिटी के विजयानगरम् हॉल से लगे लॉन में एक दिन गार्डन पार्टी हुई। जिसमें ये सभी साहित्यकार शामिल थे। सज्जाद ज़हीर के साथ अहमद अली और डॉ. रशीद जहाँ भी थीं। जब वे इस गार्डन पार्टी में पहुँचे, तो उन्होंने फ़िराक़ गोरखपुरी से इसरार किया कि वे प्रेमचंद से उन्हें मिलाएं।
बहरहाल, सज्जाद ज़हीर ने जब पहली बार प्रेमचंद को देखा, तो उनके ऊपर प्रेमचंद की दिल-आवेज़ शख़्सियत का क्या असर हुआ, उन्हीं की ज़ुबानी-‘‘एक किनारे पर तीन-चार आदमियों के समूह में छोटे-से क़द के दुबले-पतले, गोरा जर्दी लिए हुए रंग, गाल की हड्डियाँ उभरी हुई, शेरवानी, चूड़ीदार पायजामा और सफे़द खद्दर की गाँधी टोपी पहने, जो उनके सिर पर छोटी लगती थी और जिसके नीचे से उनके सिर के बाल काफ़ी बड़े-बड़े निकल पड़ रहे थे। छोटी गुच्छेदार मूँछें, जो उनके ऊपरी होंठ को ढाँपे हुए थीं। बिल्कुल ग़ैर-अहम से एक साहब खड़े हुए थे।’’
फ़िराक़ गोरखपुरी ने इन सभी को प्रेमचंद से मिलाया। प्रेमचंद से मिलने के बाद सज्जाद ज़हीर को कैसा महसूस हुआ, उन्हीं के लफ़्ज़ों में-‘‘मैंने महसूस किया कि मैं अपने साहित्य के एक महान कलाकार से मिल रहा हूँ, जो मुझे भी एक कैरेक्टर की हैसियत से देख रहा है। हालाँकि मैं अपनी तरफ़ से हर लम्हे उनकी अज़्मत और बुजुर्गी और उनके सामने अपने छोटेपन को महसूस कर रहा था, लेकिन उनका अंदाज़ बड़ा सादा-सा और अनौपचारिक था। कुछ ऐसा मालूम होता था, जैसे वह मुझसे कह रहे हैं, ‘भई सज्जाद ज़हीर, हम तो खुली हुई किताब हैं। तुम्हें अगर दिलचस्पी हो, तो पढ़ लो, बल्कि जी चाहे, तो हमें ले लो।’
मुझे एकदम यह महसूस हुआ कि जैसे हम जिस चीज़ की तलाश में थे, वह हमें मिल गई है। ऐसा साथी और हमदर्द जिसके दिलो-दिमाग़ और रूह की लटकती हुई मशाल चारों तरफ़ के धुँधलके में रौशनी के चमकते हुए क़ुमक़मे लटका देगी, हमारे रास्ते को रौशन कर देगी।’’
इस मुलाक़ात के बाद यह तय हुआ कि मौलवी अब्दुल हक़, जोश मलीहाबादी और प्रेमचंद के साथ एक बैठक और हो और उसमें उनसे प्रगतिशील लेखक संघ के प्रस्तावित उद्देश्यों और घोषणा-पत्र पर सलाह-मशविरा किया जाए। यह बैठक सज्जाद ज़हीर के घर पर हुई। जहाँ प्रेमचंद ने घोषणा-पत्र पर अपनी रज़ामंदी जताते हुए इस पर ख़ुशी-ख़ुशी अपने दस्तख़त कर दिए। इसके बाद प्रगतिशील लेखक संघ के स्वरूप और मसौदे का प्रकाशन कराया गया और उसे देश के बड़े शहरों के प्रसिद्ध साहित्यकारों को भेज दिया गया। ताकि वे इस संगठन से जुड़ें।
यह सब कवायद के बाद यह सोच बनी कि अब प्रगतिशील लेखकों की एक अखिल भारतीय कॉन्फ्रेंस हो, जिसमें इस सोच के साहित्यकार इकट्ठे हों और केन्द्रीय संगठन का बाक़ायदा निर्माण हो सके। कॉन्फ्रेंस लखनऊ में हो और इसकी अध्यक्षता प्रेमचंद से करने की दरख़्वास्त की जाए। प्रेमचंद उस वक़्त बनारस में रहते थे। सज्जाद ज़हीर संगठन के निर्माण और दूसरे मसलों पर उनसे लगातार ख़तो-किताबत करते रहते थे। प्रगतिशील साहित्य आंदोलन में प्रेमचंद की दिलचस्पी भी बढ़ रही थी। लेकिन उनकी बहुत-सी व्यस्तताएं थीं।
उस वक़्त आलम यह था कि देश के किसी भी हिस्से में हिन्दी या उर्दू की कोई भी अदबी कॉन्फ्रेंस या जलसा हो, प्रेमचंद से ही सब लोग उसकी अध्यक्षता कराते थे। प्रेमचंद भी अपने विनम्र स्वभाव की वजह से इसके लिए मना नहीं करते थे। जब सज्जाद ज़हीर ने प्रेमचंद से प्रस्तावित कॉन्फ्रेंस की अध्यक्षता के लिए लिखा, तो उन्होंने अपनी मजबूरी जताते हुए लिखा कि ‘‘इस समय उनके पास लाहौर के हिन्दी सम्मेलन और हैदराबाद दकन की हिन्दी प्रचार सभा की अध्यक्षता के आमंत्रण आ चुके हैं। इसके अलावा कन्हैयालाल मुंशी की पहल पर गाँधीजी वर्धा में भारतीय साहित्य परिषद् का एक अखिल भारतीय सम्मेलन अप्रैल में ही कराना चाहते हैं। उन्हें इसमें भी शरीक होना है। वे कहाँ-कहाँ अध्यक्षता करें ?’’
लेकिन सज्जाद ज़हीर की ज़िद और बार-बार इसरार के बाद प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ के पहले राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता इस शर्त पर करने के लिए राज़ी हो गए कि वे इसमें अपना लिखित वक्तव्य देंगे। और वे किसी मसले पर बहस चाहते हैं, तो इसका इशारा कर दें। ताकि वे बातें भी वक्तव्य में जोड़ दी जाएं।
कॉन्फ्रेंस का दिन क़रीब आया, तो सज्जाद ज़हीर और रशीद जहाँ ने फै़सला किया कि वे कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष प्रेमचंद को कार से लेकर आएंगे। ट्रेन नौ बजे के क़रीब आने वाली थी। लिहाज़ा यह तय हुआ कि साढ़े आठ बजे घर से निकला जाएगा। लेकिन वे लोग रेलवे स्टेशन के लिए निकलते, उससे पहले प्रेमचंद ताँगे पर सवार हो कर वहाँ पहुँच चुके थे। उनके साथ हिन्दी के बड़े रचनाकार जैनेन्द्र कुमार भी थे।
इसके आगे का हाल सज्जाद ज़हीर ने कुछ यूँ लिखा है, ‘‘मैं मन में सोच रहा था कि आमतौर से कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष का शानदार स्वागत किया जाता है। उन्हें प्लेटफार्म पर हार पहनाए जाते हैं। उनके जुलूस निकलते हैं। उनकी जय-जयकार होती है। और हमारा अध्यक्ष है कि ख़ुद अपनी जेब से रेल का टिकट ख़रीदकर चुपके से आ गया। स्टेशन पर स्वागत तो क्या, रास्ता बताने के लिए भी उसे कोई नहीं मिला। एक मामूली-से ताँगे पर बैठकर वह ख़ुद ही बेतकल्लुफ़ी से कॉन्फ्रेंस के आयोजकों के घर पर चला आया। हमारी उदासीनता को लेकर शिकवा-शिकायत तो दरकिनार, उसके माथे पर बल भी नहीं पड़ा। और उनसे यूँ घुल-मिल गया, जिससे मालूम होता था कि औपचारिक बातों पर समय नष्ट करना उसके लिए बिल्कुल गै़र-ज़रूरी है। यक़ीनन हमारी तहरीक एक नई क़िस्म की तहरीक थी और इसका अध्यक्ष, नए क़िस्म का अध्यक्ष था। उसकी शान उसकी विनम्रता और सादगी से ज़ाहिर होती थी।’’
प्रेमचंद सज्जाद ज़हीर के घर ही ठहरे। ज़हीर लिखते हैं, ‘‘उस समय तक हिन्दी के बड़े लेखकों में से (मुंशी प्रेमचंद के अलावा) हमारे आंदोलन में कोई शामिल नहीं था। बाबू मैथिलीशरण गुप्त, पं. बनारसी दास चतुर्वेदी, सुमित्रानंदन पंत, सुभद्रा कुमारी चौहान, पं. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आदि ने हमारे आंदोलन के प्रति सहानुभूति जताई थी, लेकिन इनमें से कोई भी कॉन्फ्रेंस में शिरकत के लिए नहीं आ रहा था।’’
सज्जाद ज़हीर ने प्रेमचंद से जब हिन्दी साहित्यकारों के इन रुझानों का ज़िक्र किया, तो प्रेमचंद ने उन्हें लिखा, ‘‘हिन्दी के बहुत-से लेखक शायद हीन-ग्रंथी के शिकार हैं।…..अभी तक उनकी समझ में इसका मतलब ही नहीं आया है। जब तक उन्हें जमा करके समझाया न जाएगा, यूँ ही अँधेरे में पड़े रहेंगे।’’ अपने इस ख़त में प्रेमचंद इस बात पर भी अपना अफ़सोस जताते हैं कि ‘‘मैं ज़्यादा वक़्त निकाल सकता, तो कानपुर क्या हरेक शहर में अपनी शाखाएं क़ायम करता, मगर यहाँ तो प्रूफ़ और ख़त लिखने से फ़ुर्सत नहीं मिलती।’’
बहरहाल, लखनऊ के मशहूर ‘रिफ़ाह-ए-आम’ क्लब में 9 अप्रैल, 1936 को प्रगतिशील लेखक संघ का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन शुरू हुआ। स्वागत वक्तव्य के बाद मुंशी प्रेमचंद सर्वसम्मति से कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष चुने गए। और उन्होंने अपना अध्यक्षीय वक्तव्य पढ़ना शुरू किया। सज्जाद ज़हीर लिखते हैं, ‘‘यह सलीस उर्दू में लिखा था। लेकिन ज़ाहिर है कि इस मजमे में गै़र-हिन्दुस्तानी बोलने वाले इलाक़ों के जितने भी डेलीगेट और विजिटर थे (जिनकी तादाद आधी से कुछ कम ही थी) उनकी समझ में वह बिल्कुल नहीं आ रहा था। वे लोग तो ख़ामोश थे ही, लेकिन उर्दू-हिन्दी वाले भी, जो इस वक्तव्य को ध्यान से सुन रहे थे, बिल्कुल ख़ामोश थे। बल्कि ऐसा मालूम होता था कि पूरी सभा मंत्रमुग्ध हो गई है।’’
प्रेमचंद ने अपने लम्बे अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रगतिशील लेखक संघ की ज़रूरत और उद्देश्यों पर रौशनी डालते हुए कहा, ‘‘हम चाहते हैं कि साहित्य केन्द्रों में हमारी परिषदें स्थापित हों और वहाँ साहित्य की प्रवृतियों पर नियमपूर्वक चर्चा हो, निबंध पढ़े जाएं, बहस हो, आलोचना-प्रत्यालोचना हो। तभी वह वातावरण बनेगा। तभी साहित्य में नये युग का आविर्भाव होगा।’’ वहीं भाषा की समस्या पर उनका कहना था, ‘‘आदर्श व्यापक होने से भाषा अपने आप सरल हो जाती है। जो साहित्यकार अमीरों का मुँह जोहने वाला है, वह रईसी रचना-शैली स्वीकार करता है। जो अवाम का है, वह अवाम की भाषा में लिखता है।’’
उन्होंने अपने इस शानदार वक्तव्य का समापन इन यादगार शब्दों से किया, ‘‘हमारी कसौटी पर वह साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिन्तन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हम में गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’’ प्रेमचंद को इस वक्तव्य को पढ़ने में कोई चालीस-पैंतालीस मिनट के आस-पास लगे। उनके इस वक्तव्य पर सज्जाद ज़हीर, तो जैसे बिल्कुल फ़िदा थे। प्रेमचंद के वक्तव्य के बारे में उनका यहाँ तक दावा था, ‘‘प्रगतिशील साहित्य आंदोलन की अपेक्षा और उद्देश्यों के सम्बन्ध में शायद इससे बेहतर चीज़ अभी तक नहीं लिखी गई है।’’

सज्जाद ज़हीर ने इस वक्तव्य की अहमियत जताते हुए आगे लिखा है, ‘‘इस लेख का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि यह हमारी भाषा के एक महान यथार्थवादी कथाकार की संवेदनामय अभिव्यक्ति है।’’
प्रेमचंद की तारीफ़ करते हुए वे आगे लिखते हैं, ‘‘प्रेमचंद एक परिश्रमी, देश प्रेमी और बेलाग साहित्यकार थे, जो अपनी कला को बेहतर बनाने और अपने अनुभव व ज्ञान को समृद्ध करने की चिंता में हमेशा रहते थे। हम नौजवानों में से अक्सर अपने वैचारिक दर्शन और शिक्षा-दीक्षा के कारण प्रगतिशीलता के रास्ते पर अभी आकर खड़े हुए थे। प्रेमचंद अपने जीवन संघर्ष और कलात्मक सृजन के अथक प्रयासों अर्थात् कर्म और अनुभव के आधार पर वहाँ पहुँचे थे। इसी कारण उनके विचारों में संतुलन, ऐतिहासिक क्रम, समावेशिता और गम्भीरता थी। उनकी बात सच्ची मालूम होती थी। यह समझ में आती थी। इसलिए उसका दिल पर असर होता था।’’
अधिवेशन 9 और 10 अप्रैल यानी दो दिन हुआ। जिसमें प्रगतिशील लेखक संघ का घोषणा-पत्र पेश किया गया और यह सर्वसम्मति से पारित हुआ। संगठन का एक संविधान भी स्वीकृत हुआ। इसका मसौदा डॉ. अब्दुल अलीम, महमूदुज़्ज़फ़र और सज्जाद ज़हीर ने मिलकर तैयार किया था। इस तरह बाक़ायदा लेखकों के एक अखिल भारतीय संगठन ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना की गई। सज्जाद ज़हीर को इसका पहला महासचिव चुन लिया गया।
प्रेमचंद एक बार प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े, तो उसी के ही होकर रह गए। लेखकों के इस महत्वाकांक्षी संगठन के विचार और उद्देश्यों को लोगों तक पहुँचाने की उन्होंने गम्भीरता से कोशिशें शुरू कीं। अपनी किताब ‘रौशनाई’ में सज्जाद ज़हीर लिखते हैं, ‘‘लखनऊ कॉन्फ्रेंस के बाद मुंशी प्रेमचंद की आंदोलन में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी बढ़ गई थी। और वे अब सही मायनो में इसके मार्गदर्शक और निर्माता बन गए थे।’’
सज्जाद जहीर का तो यहाँ तक कहना है कि ‘‘वे अपनी हिन्दी पत्रिका ‘हंस’ को इस नये आंदोलन का मुख-पत्र बनाना चाहते थे। उनकी यह इच्छा थी कि हमारा एक केन्द्रीय पत्र अंग्रेज़ी में बाक़ायदगी से प्रकाशित हो और देश की दूसरी भाषाओं में या तो नई प्रगतिशील पत्रिकाएं प्रकाशित हों या जो मौजूदा पत्रिकाएं हैं, उन्हीं को नया रंग दिया जाए। वे संगठन के घोषणा-पत्र तथा लखनऊ कॉन्फ्रेंस की व्यथा-कथा का ज़्यादा से ज़्यादा प्रचार-प्रसार चाहते थे।….वे चाहते थे कि देश के हर भाषायी क्षेत्र में संगठन की शाखाएं खुलें और ख़ुद उन्होंने इसका बीड़ा उठाया था कि अलग-अलग जगहों पर जाकर अपने व्यवहार और प्रभाव से नई इकाइयाँ क़ायम कराएंगे। वे चाहते थे कि संगठन की व्यवस्था के लिए कुछ पूर्णकालिक कार्यकर्ता हों।’’
प्रेमचंद का साहित्यिक क़द उस वक़्त बेहद बड़ा था। अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भारत साहित्य परिषद् और देश की अनेक संस्थाओं से उनका सम्बन्ध था। गाँधी जी के हिन्दुस्तानी आंदोलन से भी वे जुड़े हुए थे। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने के बाद प्रेमचंद ने इन संस्थाओं से अपना सम्बन्ध तो नहीं छोड़ा, लेकिन अपनी प्राथमिकता प्रलेसं की विचारधारा को लोगों तक पहुँचाने की बना ली। इस दौरान प्रेमचंद जिस साहित्यिक सभा या आयोजन में शामिल हुए, उन्होंने वहाँ अपना प्रगतिशील दृष्टिकोण ही प्रस्तुत किया।
प्रेमचंद ने अपनी साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के जुलाई, 1936 अंक में लखनऊ राष्ट्रीय अधिवेशन में दिए अध्यक्षीय भाषण का तो हिन्दी में अुनवाद प्रकाशित किया ही, साथ ही बनारस, पटना, नागपुर आदि देश के साहित्य और संस्कृति से जुड़े प्रमुख शहरों में अपने दोस्तों, हिन्दी और उर्दू के साहित्यकारों को प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन से भी जोड़ा। वो कांग्रेस या ‘हिन्दी साहित्य परिषद्’ के जलसों में जाते, तो इस आंदोलन के उद्देश्यों का बाक़ायदा प्रचार करते।
प्रेमचंद, प्रगतिशील लेखक संघ से कितने प्रभावित थे और इसके संगठन और विचारधारा को फैलाने के लिए उनके दिल में क्या-क्या योजनाएं थीं, यह सब बातें उनके एक ख़त से मालूम चलती हैं, जो उन्होंने सज्जाद ज़हीर को 10 मई, 1936 को लिखा था। उस वक़्त उनका क़याम बनारस में था।
अपने ख़त में प्रेमचंद लिखते हैं, ‘‘मैंने यहाँ एक ब्रांच क़ायम करने की कोशिश की है। तुम उसके मुताल्लिक़ जितना लिटरेचर हो वो भेज दो, तो मैं यहाँ के लेखकों को एक दिन इकट्ठा कर के बातचीत करूँ। बनारस रूढ़िवादिता का गढ़ है। और हमें यहाँ गम्भीर विरोध का भी सामना करना पड़ेगा। लेकिन दो-चार भले आदमी, तो मिल ही जाएंगे। जो हमारे साथ मेलजोल कर सकें। अगर मेरी स्पीच की एक उर्दू कॉपी भी भेज दो, और इसका तर्जुमा अंग्रेज़ी में हो गया हो, तो उसकी चंद कॉपियाँ और मेनीफेस्टो की चंद कॉपियाँ और मेम्बरी के फार्म के चंद पर्चे और लखनऊ कॉन्फ्रेंस की कार्यवाही की रिपोर्ट वगैरह, तो मुझे यक़ीन है कि यहाँ शाख खुल जाएगी।
फिर मैं पटना जाऊँगा। और वहाँ भी एक शाख़ कायम करने की कोशिश करूँगा। आज बाबू सम्पूर्णानंद से इसी के मुताल्लिक़ कुछ बातें हुईं। वो भी मुझी को आगे करना चाहते हैं। मैं चाहता था कि वो पेश-क़दमी करते, मगर शायद उनकी मसरूफ़ियतें बहुत हैं। बाबू जयप्रकाश नारायण साहब से भी बातें हुईं। उन्होंने प्रोग्रेसिव अदबी हफ़्तावार हिन्दी में प्रकाशित करने की सलाह दी। जिसकी उन्होंने काफ़ी ज़रूरत बताई। अंग्रेज़ी मैगज़ीन का मसला भी सामने है। मैं समझता हूँ कि हर एक ज़ुबान में एक-एक प्रोग्रेसिव पर्चा चल सकता है। ज़रा मुस्तैदी की ज़रूरत है।’’
प्रेमचंद के इस मुख़्तसर ख़त से हमें कई अहम बातें मालूम चलती हैं। पहली, बनारस रूढ़िवादिता का गढ़ है। प्रगतिशील लेखक संघ का काम जब शुरू होगा, तो हो सकता है कि इसका विरोध भी झेलना पड़े। बावजूद इसके वे आश्वस्त थे कि कुछ लोग तो ऐसे मिल ही जाएंगे, जो उनकी मदद करें। इसके अलावा पटना में वे प्रगतिशील लेखक संघ से बाबू सम्पूर्णानंद को भी जोड़ना चाहते थे, लेकिन अपनी राजनीतिक व्यस्तताओं के चलते सम्पूर्णानंद संगठन के लिए समय नहीं निकाल पाये। अलबत्ता वे इस मुहिम की अगुवाई के लिए प्रेमचंद को ही माक़ूल शख़्सियत मानते थे।
प्रेमचंद के इस ख़त से यह भी मालूम चलता है कि समाजवादी लीडर जयप्रकाश नारायण भी प्रगतिशील लेखक संघ की सरपरस्ती कर रहे थे। और उन्होंने संगठन के विस्तार के लिए प्रेमचंद को कई सलाहें दी थीं। जिसमें एक प्रगतिशील साहित्यिक साप्ताहिक अख़बार प्रकाशित करने की सलाह भी थी। प्रेमचंद ख़ुद यह चाहते थे कि देश की हर भाषा में एक प्रगतिशील अख़बार निकले, लेकिन इसके लिए तत्परता और पूरी तैयारी के साथ काम करना होगा। यानी प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने के बाद प्रेमचंद ने इस संगठन के विस्तार के लिए पूरी गंभीरता से काम किया।
प्रेमचंद उस वक़्त न सिर्फ सांगठनिक दृष्टि से बेहद सक्रिय थे, बल्कि उनके लेखन में भी अब बदलाव दिखाई देने लगा था। साल 1936 वह साल है, जिसमें ‘गोदान’ जैसा एपिक उपन्यास, ‘कफ़न’ जैसी कालजयी कहानी और दिल को झिंझोड़ देने वाला निबंध ‘महाजनी सभ्यता’ उनकी धारदार क़लम से निकला। प्रेमचंद की इन रचनाओं से पाठक पहली बार भारतीय समाज की वास्तविक और कठोर सच्चाइयों से सीधे-सीधे रू-ब-रू हुए। उनके इस लेखन ने भारतीय समाज को हिलाकर रख दिया। तीन अलग-अलग रचनाओं में उन्होंने बिल्कुल मुख़्तलिफ़ सवालों को पाठकों के सामने रखा था।
‘गोदान’ जहाँ भारतीय गाँवों और किसान जीवन का महाआख्यान है, तो वहीं ‘कफ़न’ दलित जीवन की दर्दनाक कहानी है। सज्जाद ज़हीर ने कहानी ‘कफ़न’ पढ़ी, तो उन पर इसका क्या असर हुआ, उन्हीं की ज़ुबानी-‘‘जब मैंने इस कहानी को पढ़ा, तो स्तब्ध रह गया। इसलिए कि वह अपनी वेदनामय सुन्दरता, सही सामाजिक चेतना, गहरी इंसान दोस्ती और दिल में चुभ जाने वाली धूप की तरह उजली और हरारत भरी, यथार्थ चित्रण की दृष्टि से प्रेमचंद के कलात्मक उत्कर्ष को व्यक्त करने वाली रचना थी। और तमाम नौजवान लेखकों के लिए आदर्श की हैसियत रखती थी।’’
प्रेमचंद का निबंध ‘महाजनी सभ्यता’ जोश मलीहाबादी के सम्पादन में दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका ‘कलीम’ में प्रकाशित हुआ। अपनी किताब ‘रौशनाई’ में इस निबंध पर टिप्पणी करते हुए सज्जाद ज़हीर लिखते हैं-‘‘इस निबंध में प्रेमचंद ने महाजनी सभ्यता के अमानवीय, असभ्यता और पाशविकतापूर्ण तौर-तरीक़ों की बड़े तीखे़ लफ़्ज़ों में विरोध किया था। अपनी लेखनी से पहली बार ऐसे इंसानी समाज की तारीफ़ की थी, जो आपसी समानता, सहयोग और इंसाफ़ की बुनियाद पर क़ायम हो और इसकी ज़िंदा मिसालें उन्हें पश्चिम के एक मुल्क (रूस) में नज़र आ रही थीं। इसमें उन्होंने यह उम्मीद और यक़ीन बयाँ किया था कि आख़िरकार इंसानी बिरादरी मुहब्बत, परोपकार और समाजी इंसाफ़ के इन्हीं उसूलों पर आगे बढ़ेगी। और सारी दुनिया से इंसान के द्वारा इंसान के शोषण का चलन उठ जाएगा।’’
प्रेमचंद ने अपने निबंध ‘महाजनी सभ्यता’ में पूँजीवादी व्यवस्था पर जो सवाल उठाए, वे आज और भी ज़्यादा विकराल रूप ले चुके हैं। इस ‘महाजनी सभ्यता’ की गिरफ़्त में आहिस्ता-आहिस्ता हमारा पूरा समाज आ गया है। साहित्यिक लेखन के अलावा प्रेमचंद ‘हंस’ पत्रिका के सम्पादकीय और अपने आलेखों में भी प्रगतिशील विचारों को आगे बढ़ा रहे थे। उन्होंने अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य प्रगतिशील और जनवादी विचारों को अधिक से अधिक देशवासियों तक पहुँचाना बना लिया था। लेकिन अफ़सोस, कुछ ही महीनों के बाद प्रेमचंद को बीमारी ने अपने आगोश में ले लिया।
सज्जाद ज़हीर को इस बात का पता चला, तो वे उनकी मिज़ाजपुर्सी के लिए बनारस पहुँच गए। सज्जाद ज़हीर ने ‘रौशनाई’ में प्रेमचंद से अपनी आख़िरी मुलाक़ात का ज़िक्र दिल को छू लेने वाले अंदाज़ में किया है। वह लिखते हैं-‘‘मैंने उन्हें सलाम किया, तो जवाब देते हुए उनके चेहरे पर वही दिलकश मुस्कराहट फैल गई, जो उनसे मिलने पर हमेशा मुझे महकते हुए मोतिए के फूलों के तोहफ़े की तरह मिला करती थी। कमज़ोर आवाज़ में वे मुझसे प्रगतिशील लेखक संघ के बारे में पूछते रहे। मैं कलकत्ता से वापस आ रहा था। मैंने उन्हें बताया कि बंगाल में कई जगह हमारे संगठन की कई शाखाएँ खुल गई हैं।

वे इस बात पर बहुत ख़ुश हुए और कहने लगे कि ‘अपनी बीमारी की वजह से इस समय तक वे ख़ुद अपने प्रोग्राम के मुताबिक़ पटना और बनारस में शाखाएं क़ायम नहीं कर सके। लेकिन जैसे ही अच्छे होंगे, वे वैसा ज़रूर करेंगे।’’’ सज्जाद ज़हीर की इस बात से पता चलता है कि प्रेमचंद भले ही मौत और ज़िंदगी के बीच जूझ रहे थे, लेकिन उनकी फ़िक्र प्रगतिशील लेखक संघ के विस्तार में ज़्यादा थी। और सेहतमंद होने के बाद वे फिर इस काम में जुट जाने की चाहत रखते थे।
सज्जाद ज़हीर आगे लिखते हैं-‘‘उनकी बीमारी सख़्त थी, लेकिन मरज़ कोई ज़्यादा ख़तरनाक और असाध्य नहीं था, जिसका इलाज देखभाल, अच्छे आरामदेह माहौल के ज़रिए न किया जा सके। उस मकान में जहाँ प्रेमचंद थे, वहाँ साफ़ हवा थी और उनकी चाहने वाली बीवी से ज़्यादा बेहतर और कौन तीमारदारी कर सकता था। लेकिन अभावग्रस्तता और ग़रीबी की फ़ज़ा वहाँ छाई हुई थी, उसे देखकर यह दर्द दिल में बार-बार उठता था कि प्रेमचंद जी की सारी बीमारी की बुनियाद दरअसल, उनकी तंगदस्ती है। यह वाक़िआ महज़ एक इत्तिफ़ाक़ नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी भर की आर्थिक और जिस्मानी मुसीबतों व चिंताओं का लाज़िमी नतीजा मालूम होता था।’’
प्रेमचंद को ज़्यादा लम्बी ज़िंदगी नहीं मिली। प्रगतिशील लेखक संघ गठन के सिर्फ़ छह महीने बाद ही बीमारी से जूझते हुए महज़ छप्पन साल की उम्र में 8 अक्टूबर, 1936 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। यदि उन्हें और ज़िंदगी मिलती, तो प्रगतिशील लेखक संघ को निश्चित तौर पर उनकी व्यापक दृष्टि और विचारों का फ़ायदा पहुँचता। प्रगतिशील लेखक संघ सज्जाद ज़हीर और मुल्कराज आनंद की ही अकेली विरासत नहीं है, प्रेमचंद भी इस संगठन के रहनुमा थे। और प्रगतिशील लेखक संघ का आज जो हमें स्वरूप दिखाई देता है, उसमें प्रेमचंद की रहनुमाई का भी बड़ा हाथ है।
प्रेमचंद की असमय मौत का सबसे ज़्यादा ग़म और अफ़सोस सज्जाद ज़हीर को हुआ। जिसका इज़हार उन्होंने बड़े ही ग़मगीन लफ़्ज़ों में ‘रौशनाई’ में किया है। प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन में प्रेमचंद के बेमिसाल योगदान को याद करते हुए वे लिखते हैं, ‘‘यह दुःख और भी बढ़ जाता है, जब यह एहसास हो कि मरने वाले को अभी मरना न था, अभी उसकी जिजीविषा ने उसे जवाब न दिया था। बल्कि एक क्रूर और कृतघ्न समाज ने अपनी उपेक्षा से एक मूल्यवान हीरे को मौत के हाथों कौड़ियों के मोल बेच दिया।
दुनिया के सबसे बड़े राष्ट्र का एक महान साहित्यकार, दस करोड़ हिन्दी और उर्दू बोलने वालों का सबसे बड़ा कथाकार, ज़रूरी नहीं कि इस तरह और इन हालात में यहाँ से उठ जाए जैसा कि प्रेमचंद। वे बूढ़े न थे। अभी तो उनकी जवानी ख़त्म हुई थी। और प्रौढ़ावस्था की शुरूआत थी। उनका आर्ट सौंदर्य, चिन्तन और प्रभावमयता की नई बुलंदियों पर पहुँच रहा था। उसमें सक्रियता और विकास बराबर जारी था। अपने समाज की चेतना, अपने राष्ट्र के आम मेहनतकशों, ईमानदार लोगों के प्रति उनका लगाव और उनके लिए, सीने का दर्द बढ़ रहा था…ऐसे में वे यकायक दामन झाड़कर उठ खड़े हुए और हमें छोड़कर चले गए।
शायद इसलिए कि एक अच्छे शिक्षक और मार्गदर्शक की तरह हमें सख़्ती से यह सबक़ सिखाएँ कि दुनिया का हर जीवित और सच्चाई पर टिका हुआ आंदोलन किसी एक व्यक्ति का इतना आश्रित नहीं होता कि उसके बिना वह चल ही न सके। प्रेमचंद उठ गए। लेकिन हमारे कथा-साहित्य के उपवन में यथार्थ चित्रण और मानव-मैत्री के जो नाजुक पौधे उन्होंने लगाए थे, आज वे फल-फूल रहे हैं। प्रगतिशील साहित्य का आंदोलन, जिसकी उन्होंने शुरुआती और मुश्किल दिनों में रहनुमाई की थी, आज देश का सबसे बड़ा और सबसे महत्त्वपूर्ण साहित्यिक आंदोलन है।’’ (‘रौशनाई तरक़्क़ीपसंद तहरीक की यादें’, लेखक: सज्जाद ज़हीर, उर्दू से हिन्दी अनुवाद: जानकीप्रसाद शर्मा, प्रकाशक: वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, पेज: 122)
(ज़ाहिद ख़ान गंभीर सिनेमा और प्रगतिशील साहित्य पर लिखते रहते हैं।)